Monday, 14 September 2015

Dukh Ka Adhikaar! :-)

दुःख का अधिकार

प्र   मनुष्य के जीवन में पोशाक का क्या महत्त्व है ?

उ  मनुष्य के जीवन में पोशाक का बड़ा ही महत्त्व है . पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्ज़ा निश्चित करती है।  वह हमारे लिए अनेक दरवाज़े खोल देती है और कभी - कभी अड़चन बन जाती है।

प्र   पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है ?

उ  जब हम अपने से कम हैसियत रखने वाले मनुष्य के साथ बात करते हैं , तो हमारी पोशाक हमें ऐसे नहीं करने देती , तब हम स्वयं को छोटा या बड़ा मानते हैं।  वह हमें हमारे उत्तम स्तिथि का ज्ञात कराती है और अड़चन और बंधन बन जाती है।

प्र   लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाए ?

उ  लेखक ने देखा कि  वह स्त्री फुटपाथ पर बैठकर फ़फ़क  - फ़फ़क  कर रो रही थी।  वह उसका दुःख बांटना तो चाहता था ,किन्तु उसके साथ बाज़ार में बैठकर उसका हाल - चाल जानना कठिन था।  इससे उसे भी संकोच होता और लोग भी व्यंग्य करते।  इसलिए चाहकर भी वह उसके रोने का कारण नहीं जान पाया।

प्र   भगवान अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था ?

उ  भगवान के पास डेढ़ बीघा ज़मीन  था , जिस पर वह कछियारी करके हरी सब्ज़िया और ख़रबूज़े बाज़ार में बेचकर अपने परिवार का निर्वाह करता था।

प्र   लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुढ़िया ख़रबूज़े बेचने के लिए क्यों चल पड़ी ?

उ  एक दिन खेत में लड़के को साँप  ने डस  लिया , तब बुढ़िया ने झाड़ - फूँक  के लिए ओझा बुलाया, जो घर के सारे पैसे ले गया।  घर का राशन भी ख़त्म हो गया।  उसकी बहु बुखार से टप रही थी,  घर की हालत बहुत ही खराब थी , इसलिए पैसे कमाने के उद्देश्य से बुढ़िया अगले ही दिन ख़रबूज़े बेचने बाज़ार  निकल पड़ी।

प्र    बुढ़िया के दुःख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस के संभ्रांत महिला के बारे में क्यों याद आया ?

उ  बुढ़िया को देखकर लेखक को पड़ोस वाली संभ्रांत महिला की इसलिए याद आई क्योंकि उस महिला ने भी अपना जवान बेटा खो दिया था।  लेकिन आमिर होने के कारण उसके पास बहुत पैसे और समय था।  बुढ़िया का साथ देने वाला कोई नहीं था , इसलिए बेटे की मृत्यु के तुरंत बाद ही परिवार चलाने के लिए काम करना पड़ा।

प्र  बाजार के लोग ख़रबूज़े बेचने स्त्री को क्या - क्या कह रहे थे ?

उ  बाजार के लोग उस स्त्री के बारे में तरह - तरह के ब्यंग्य कर रहे थे।  कुछ क्लोज उसे बेहया औरत कह रहे थे और कुछ उसे घृणा से देख रहे थे।  सामने के फुटपाथ पैट खड़े एक आदमी ने दियासलाई से अपना कान खुजाते हुए कहा कि  , "अरे! इन लोगों का क्या है? इन कमीनों के लिए बेटा - बेटी, खसम - लुगाई , धर्म - -ईमान , सब रोटी का टुकड़ा है " .

प्र   पास - पड़ोस की दुकानों से पूछने पर क्या पता चला ?

उ  पास - पड़ोस के दुकानों से पूछने पर यह पता चला कि  उस बुढ़िया का तेईस बरस का एक जवान बेटा था।  घर में उसकी बहु और पोता - पोती हैं।  लड़का शहर के पास डेढ़ बीघा ज़मीन  में कछियारी करके परिवार का भरण - पोषण करता था।  खरबूजों की डलियाँ बाजार में पहुंचाकर कभी लड़का स्वयं सौदे के लिए बैठ जाता , तो कभी माँ बैठ जाती।  लड़का परसों सुबह मुँह  - अँधेरे बेलों में से जब पके हुए ख़रबूज़े चुन रहा था, तब दुर्भाग्यवश एक साँप  ने उसे काट लिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

प्र   लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया ने क्या - क्या किया ?

उ  लड़के को बचाने के लिए बूढी माँ बावली होकर ओझा बुला लाइ।  झाड़ना - फूंकना हुआ, नागदेव की पूजा हुई. पूजा के लिए दान - दक्षिणा चाहिए था , जिसमे घर का अनाज और आटा  खर्च हो गया , बहु और बच्चे भगवान से लिपट - लिपट कर रो रहे थे, फिर भी पुरे शरीर में विष के फैलने से भगवान की मृत्यु हो गई।

प्र   लेखक ने बुढ़िया के दुःख का अंदाज़ा कैसे लगाया ?

उ  बुढ़िया ख़रबूज़े बेचते समय अपना मुँह  छुपाकर फ़फ़क  - फ़फ़क  कर रो रही थी, इसी से लेखक ने उसके दुःख का अंदाज़ा लगाया

प्र   इस पाठ का शीर्षक 'दुःख का अधिकार' कहाँ तक सार्थक है ?

उ  इस पाठ का शीर्षक 'दुःख का अधिकार' एकदम उचित है।  लेखक यह कहना चाहते हैं कि  दुःख का अधिकार सब को है, किन्तु उसे जताना या मनाना सभी के लिए संभव नहीं है।  एक महिला सम्पन्न है , दुःख मनाने  के लिए उसके पास धन है, समय है और डॉक्टर  भी है. सभी साधन उपलब्ध हैं, एक ओर  ग़रीब  लोग हैं, जो अभागे हैं. वो चाहें  तो भी शोक प्रकट करने के लिए दो आँसू  भी नहीं बहा सकते, क्योंकि जीवन के नित्य प्रति समस्याएँ  उनके सामने पहाड़ की तरह हैं, जिनको सुलझाने में ही उनका पूरा समय व्यतीत हो जाता है। 


प्र   जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिरने देती उसी तरह ख़ास परिस्तिथियों में हमारी पोशाक हमें झुकने से रोक देती है।

उ  आशय :  डोर से काटने के बाद पतंग को आना तो ज़मीन  पर ही होता है पर हवा के झोंके उसे देर तक इधर - उधर उड़ने पर मज़बूर करते हैं।  इसी तरह जब हम किसी ख़ास पोशाक में होते हैं तब हम मैले कपडे पहने लोगों के पीछे या साथ बैठने में संकोच करते हैं।  हमें अपने वस्त्र मैले होने का दर सताता है , हम सोचते हैं कि  लोग क्या कहेंगे।

प्र   इनके लिए बेटा - बेटी , खसम - लुगाई, धर्म - ईमान, सब रोटी का टुकड़ा है।

उ  आशय :  एक राह चलता आदमी भगवान की माँ को बेटे की मृत्यु  के अगले ही दिन खरबूजा बेचता देख कहता है - यह ग़रीब  लोग कमीने होते हैं - इनको अपने किसी भी रिश्ते की कद्र  नहीं है, इनके लिए बेटा - बेटी , ख़सम  - लुगाई, धर्म - ईमान सब पैसा है।  एक रोटी के टुकड़े के लिए अपनी भावनाओं को छोड़ देते हैं।

प्र   शोक करने , ग़म  मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और दुःख होने का अधिकार होता है ?

उ  आशय :  मनुष्य को दुःख होता है, फिर चाहे वह आमिर हो या ग़रीब।  हालाँकि  आमिर लोगों के पास काफी पैसे और समय दोनों होता है , इसलिए वह आराम से दुःख मना सकते हैं , लेकिन ग़रीब  लोगों के पास न तो समय है न ही पैसा।  इसलिए चाह कर भी वे दुःख नहीं मना सकते।  अपने रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए उन्हें अपना दुःख छिपाकर काम करना ही पड़ता है।

प्र   हम दूसरों के दुःख को देखकर हंसी क्यों उड़ाते हैं ?

उ  मनुष्य का गन है कि  जब तक मुसीबत उसके सर पर नहीं टूटी , तब तक वह उसका दर्द नहीं समझ पाटा।  उदाहरण के लिए हकला कर बोलने वालों का समाज में  बहुत मज़ाक उड़ाया जाता है , किन्तु जब पाने किसी परिवार में कोई हकलाता है तो बहुत दुःख होता है।

बस इतना ही। । समाप्त

Seetha Lakshmi! :-)

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