Monday, 7 September 2015

Dhool

धूल

प्र   हीरे के प्रेमी उसे किस रूप में पसंद करते हैं?

उ  हीरे के प्रेमी उसे शायद साफ़ - सुथरा, खुराडा हुआ , आँखों में चकाचौंध पैदा करता हुआ देखना पसंद करते हैं।

प्र   लेखक ने संसार में किस प्रकार के सुख को दुर्लभ माना है ?

उ  जिस बच्ची ने धूल से खेला वह जवानी में धूल की मिटटी से कैसे वंचित रह सकता है ?  अगर रहता है तो वह उसका दुर्भाग्य है।  यह साधारण धूल नहीं वरन तेल और मिटटी से सिंचाई हुई वह मिटटी है, जिसे देवता पर चढ़ाया जाता है, संसार में ऐसे सुख को ही लेखक दुर्लभ मानते हैं। 

प्र   मिटटी की आभा क्या है ? उसकी पहचान किससे  होती  है ?

उ  मिटटी की आभा का नाम ही धूल है और मिटटी के रंग - रूपों की पहचान धूल से ही होती है।  ग्राम भाषाएँ  अपने सूक्ष्म बोध से धूल की जगह गर्द का प्रयोग कभी नहीं करती।  धूल वह जिसे गोधूलि कहा गया है। 

लिखित प्रश्न उत्तर

प्र   धूल के बिना। ……। नहीं किया जा सकता ?

उ  धूल के बिना किसी शिशु की कल्पना हो ही नहीं सकती।  फूल के ऊपर जो रेणु श्रृंगार बनती है , वही धूल शिशु के मुंह पर उसकी सहज पार्थिवता को निखार।  आजकल प्रसाधन सामग्री का जो बोल बाला है उसकी तुलना में बालकृष्ण के मुंह पर छाई गोधूलि बहुत श्रेष्ठ है।

प्र   हमारी सभ्यता। ......................... चाहती है ?

उ  हमारी सभ्यता इस धूल के संसर्ग से बचना चाहती है।  वह आसमान ,इ अपना घर बनाना चाहती है , इसीलिए माँ अपने शिशु से कहती है कि धूल से मत खेलो। वह समझती है के धूल से उसके वस्त्र पर चढ़े नकली सलमा सितारा धुंधला पड़ जाएगा।

प्र   अखाड़े की मिटटी की क्या विशेषता है ?

उ  clarity  required  :-)

प्र   श्रद्धा भक्ति और स्नेह की व्यंजना के लिए धूल सर्वोत्तम साधन किस प्रकार है ?

उ  श्रद्धा, भक्ति और स्नेह की व्यंजना के लिए धूल से बढ़कर और क्या साधन है ? यहाँ तक कि  घृणा , असूया आदि के लिए भी धूल चाटने , मुंह पर धूल आदि मुहावरे प्रचलित हैं।

प्र   इस पाठ में लेखक ने नागरीय सभ्यता पर क्या व्यंग्य किया है ?

उ  हमारी सभ्यता इस धूल के संसर्ग से बचना चाहती है।  वह धूल से बच - बचाकर आसमान पर घर बना लेती है , माँ - बाप बच्चों को धूल में खेलने से मना करते हैं , किन्तु हम यह भूल जाते हैं कि  इसी मिटटी पर किसान हल जोतकर हमारे लिए फसल उगाता है , इसी धूल से हमें, खनिज पदार्थ , खाना , हीरे, सोना इत्यादि मिलते हैं।

प्र  लेखक 'बालकृष्ण' के मुंह पर छाई  हुई गोधूलि को श्रेष्ठ क्यों मानते हैं ?

उ  बालकृष्ण के मुंह पर छाई  वास्तविक गोधूलि के सामने बाकी कृत्रिम सौंदर्य सामग्री धूल के समान हैं।

प्र   लेखक ने धूल और मिटटी में क्या अंतर बताया है ?

उ  किसी के चलने या दौड़ने से जब मिटटी उड़े तो उसे धूल कहते हैं और जो नहीं उड़ती उसे मिटटी का नाम दिया जाता है।

प्र   ग्रामीण परिवेश में। …… प्रस्तुत करती है ?

उ  मिटटी की आभा का नाम ही धूल है और मिटटी के रंग - रूप की पहचान उसकी धूल से ही होती है।  ग्राम भाषाएँ  गर्द  की जगह धूल शब्द का ही प्रयोग करतीं  हैं।  धूल गोधूलि शब्द में अमर हो गया है।  सूर्योदय के समय यही धूल सोने की तरह चमक उठती है और सूर्यास्त के समय गौओं के चलने पर यह उड़ती - उड़ती लाल आकाश में पीली रुई की तरह सुन्दर रूप लेती हैं। 

प्र   हीरा वही। ……। स्पष्ट कीजिए।

उ  "हीरा वही घन चोट न टूटे "  इसका मतलब यह है कि  हम कांच से प्यार कर बैठते हैं, यानि  के नश्वर वस्तुओं को अधिक महत्त्व देते हैं और धूलि भरा हीरा यानि  कि  अंदर की कांति  यानि सुंदरता को पहचान नहीं पाते। पर बाहरी सुंदरता की तुलना में एक दिन अंदरुनी सुंदरता एक दिन अपना प्रभाव दिखा जाती है।

प्र   धूल , …।  व्यजनाओं को स्पष्ट करो।

उ  यह सब एक ही वस्तु के अलग - अलग नाम हैं।  यदि धूल जीवन का यथार्थवादी गद्य है तो धूलि उसकी कविता है।  धूलि छायावादी दर्शन (fiction ) है , जिसकी वास्तविकता संदिग्ध है और धुरी लोक संस्कृति का जागरण है।  इनका सबका तो रूप एक ही है किन्तु रूप भिन्न हैं।  मिटटी काली, पीली , लाल  और की अन्य रंगों की होती है पर धूल के नाम से ही जानी जाती है।  गौओं के चलने पर जो धूल उड़ती है उसे गोधूलि का नाम दिया जाता है।

प्र   धूल पाठ का आशय स्पष्ट कीजिए


बाकी कल।  

Seetha Lakshmi! :-)

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