धर्म की आड़
मौखिक प्रश्नोत्तर
प्र १ आज धर्म के नाम पर क्या क्या हो रहा है ?
उ धर्म के नाम पर आजकल व्यापार किया जा रहा है. अपने आप को धार्मिक समझने वाले, ऊँचे धार्मिक पद वाले आम जनता, जिसे धर्म का सही अर्थ नहीं मालूम, उनका शारीरिक तथा मानसिक रूप से शोषण कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण अज्ञानता है।
प्र २ धर्म के व्यापार को रोकने के लिए क्या उद्योग होने चाहिए ?
उ इस बुराई को रोकने के लिये हमें धर्म को सही अर्थों में समझना होगा। धर्म के नाम पर होने वाले ढोंग में सहकारी नहीं बनना चाहिए। इस नाम पर होने वाले सभी कुरीतियों का दृढ़ विशवास से निडर होकर लड़ना चाहिए।
प्र ३. लेखक के अनुसार स्वाधीनता आंदोलन का कौन - सा दिन सबसे बुरा था ?
उ स्वाधीनता आंदोलन का वह दिन सबसे बुरा कहा जा सकता है, जब, धर्माचार्यों, मुल्ला - मौलवियों एवं मठाधिपतियों को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया गया।
प्र ४ साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में क्या बात अच्छी तरह घर कर बैठी है ?
उ साधारण से साधारण आदमी के मन में यह बात घर कर गई है कि धर्म के नाम पर या उसकी सम्मान की रक्षा के लिए प्राण देना या प्राण लेना उचित है। यह धर्म को उसके गूढ़ तत्व के बारे में नहीं जानने का परिणाम है।
प्र ५ धर्म के स्पष्ट चिह्न क्या हैं ?
उ शुद्ध आचरण, सदाचार एवं हर प्राणी में ईश्वर को देखना ही धर्म के चिह्न हैं।
लिखित
प्र १ चलते - पुर्ज़े लोग धर्म के नाम पर क्या करते हैं ?
उ चलते - पुर्ज़े (read influential) लोग दरम के नाम पर लोगों की शक्तियों या दुर्बलता का भरपूर उपयोग करते हैं। साधारण लोगों की अज्ञानता का लाभ उठाकर वे अपना बोलबाला बनाये रखना चाहते हैं। इनका धंधा ऐसे भोले - भाले / अज्ञान लोगों की नींव पर चलता है।
प्र २ चालाक लोग साधारण आदमी की किस अवस्था का लाभ उठाते हैं ?
उ साधारण जनता बहुत ही धार्मिक और निष्ठावान होती है। उसे धर्म के गूढ़ तत्वों का पूर्ण ज्ञान नहीं। उसकी इसी अज्ञानता का परिपूर्ण लाभ उठाकर धर्म के नाम पर दंगे - फसाद करवाये जाते हैं। इसके पीछे, धार्मिक तथा राजनितिक नेताओं का अपना स्वार्थ होता है. साधारण जनता का घर जल जाता है जिसमे ये लोग अपने हाथ सेंकते हैं। (read: fulfill their desires)
प्र ३ आनेवाला समय किस प्रकार के धर्म को टिकने नहीं देगा ?
उ समय के साथ - साथ , कई कठिनाइयों एवं हानियों का सामना करके लोगों की समझ में यह आ गया है कि कुछ बड़े लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्म के नाम पर ढोंग करते हैं। शिक्षा - स्तर के बढ़ने से भी समाज में काफी बदलाव आ गया है। सभी को यह समझ आ गया है कि धर्म या मज़हब सिर्फ प्रेम-प्यार की भावना को बढ़ावा देता है घृणा को नहीं। मानव - मानव में ईश्वर को देखना और मानव- सेवा करना ही सच्चा धर्म है। :-)
प्र ४ कौन - सा कार्य देश की स्वाधीनता के विरुद्ध समझा जाएगा ?
उ स्वंतंत्र देश की यही सबसे बड़ी विशेषता है की प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिसाब से जीवन - यापन करने का अधिकार है. हमारा देश एक गणतंत्र (republic) राज्य है। इसमें किसी को भी अपने मनचाहे धर्म को पालन करने का हक़ है। किन्तु कुछ स्वार्थी लोग अपने मतलब के लिए धर्म के नाम पर लोगों को एक - दूसरे से लड़वाते हैं. धर्म को सही मायनों में न समझने वाले लोग इनकी बातों को मान कर मरने - मारने पर उतारहो जातें हैं। ऐसा कोई भी कार्य स्वाधीनता के विरुद्ध है।
प्र ५ पाश्चात्य देशों में धनी और निर्धन लोगों में क्या अंतर है ?
उ हमारे देश के लोगों की यह धारणा है कि पाश्चात्य के सभी निवासी धनी हैं, किन्तु यह सच्चाई से कोसों दूर है। वहां भी निर्धनता है। गरीब लोगों को लालच देखकर, उनका शोषण करके कुछ अमीर लोग अपना स्वार्थ निभाते हैं। हर देश की तरह यहाँ भी अमीर - ग़रीब का फ़र्क है. गरीब को लगातार संघर्ष के बाद ही सफलता मिलती है। समाजवाद (read Socialism) का जन्म इसी कारण हुआ।
प्र ६ कौन - से लोग धार्मिक लोगों से अधिक अच्छे हैं ?
उ कुछ लोग ईश्वरीय तत्व में विशवास नहीं रखते , किन्तु सह मानव के जीवन में अन्धकार दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, उनका दुःख दूर करने का हर संभव प्रयास करते हैं , लोगों को दह्र्म के नाम पर नहीं उकसाते एवं लड़ाई, झगड़ा या फसाद पैदा नहीं करते. ऐसे लोग धार्मिक लोगों से की गुना बेहतर हैं।
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर ५० - ६० शब्दों में दीजिए।
प्र १ 'धर्म और ईमान' के नाम पर किए जाने वाले भीषण व्यापार को कैसे रोका जा सकता है ?
उ आजकल धर्म के नाम पर व्यापार चलता है। हमें ऐसे कपटी धूर्त लोगों का पर्दाफ़ाश(read expose) करना होगा जो धर्म और ईमान के नाम पर लोगों को एक - दूसरे से लड़वाते हैं। मनुष्य एक दूसरे के प्राण लेते हैं। यह सब रोकने के लिए हम धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में समझना होगा। रीति - रिवाज़ों के सच्चे अर्थ समझने होंगे। यह समझना आवश्यक है कि मनुष्यता से पर कोई धर्म नहीं है।
प्र २ 'बुद्धि पर मार' के सम्बन्ध में लेखक के क्या विचार हैं ?
उ मनुष्य और पशु - पक्षियों में सबसे बड़ा अंतर यही है कि हम सोचने - समझने की शक्ति रखते हैं. किसी भी हालात में मनुष्य को अपनी यह समझ नहीं खोनी चाहिए। किसी की चिकनी - चुपड़ी बातों में आकर अपना आपा नहीं खोना चाहिए। हर हालत में अपनी सोच का सही इस्तेमाल कर निश्चय लेना चाहिए।
प्र ३ लेखक की दृष्टी में धर्म की भावना कैसी होनी चाहिए ?
उ लेखक के अनुसार धर्म की भावना सदाचार, शुद्ध आचार - विचार एवं जीवनशैली का मेल है। केवल धार्मिक रीति -रिवाज़ों का आँख मूँद कर पालन नहीं करना चाहिए वरन मनुष्यता के भाव होने चाहिए। लोक - कल्याण हेतु कार्य करने चाहिए। यह समझना चाहिए कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। अपने धर्म का ही नहीं बल्कि बाकी धर्मों का भी सम्मान करना आवश्यक है।
प्र ४ महात्मा गांधी के धर्म - सम्बन्धी विचारों पर प्रकाश डालिए।
उ महात्मा गांधी जी के जीवन में धर्म का सर्वोपरि स्थान था। वे जीवन के हर कदम पर धर्म का आचरण करते थे। उनका धर्म सत्य , अहिंसा एवं लोक - कल्याण था। उनके अनुसार धर्म में केवल उच्च भावनाओं के लिए ही स्थान होना चाहिए।
प्र ५ सबके कल्याण हेतु अपने आचरण को सुधारना क्यों आवश्यक है ?
उ हम ऐसे समय में रहते हैं, जहाँ मनुष्यता धीरे - धीरे समाप्त होती जा रही है. मनुष्य के मन में घृणा, स्वार्थ, अज्ञानता, जलन आदि ने घर कर लिया है, इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन को सदाचार एवं शुद्ध विचारों से भरें। अपने हित के बारे में ही सदैव विचार न करें अपितु समाज के उत्थान के लिए भी कमर कसें। यदि मन में शुद्ध विचार का अभाव हो और पूजा - पाठ एवं रीति - रिवाज़ों आँख मूँद कर पालन करें तो समय ही व्यर्थ जाएगा। जान कल्याण सदाचार आवश्यक है।
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।
प्र १ उबाल पड़ने वाला साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह कुछ भी नहीं समझता - बूझता, और दूसरे लोग उसे जिधर भी जोत देते है, उधर जुत जाता है।
उ इसका आशय यह है कि साधारण व्यक्ति के मन में धर्म के प्रति अंधी - श्रद्धा होती है, वह धर्म के गूढ़ तत्वों को नहीं समझता। वह धर्म के नाम पर प्राण देना या लेना पुण्य समझता है। उसके इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर समाज - विरोधी तत्व उससे दंगे - फसाद करवाते है। उसे जो कहा जाता है , अपनी बुद्धि का उपयोग न करते हुए कर डालता है।
प्र २ यहाँ पर बुद्धि पर पर्दा डालकर पहले ईश्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना, और फिर धर्म, ईमान, ईश्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वार्थ - सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाना - भिड़ाना।
उ भारत एक धार्मिक देश है। प्राचीनकाल से यहाँ बहुत सारे धार्मिक गुरुओं तथा संतों का जन्म हुआ है. इसी बात का फ़ायदा उठाकर कुछ स्वार्थी लोग अपने को भगवान का अवार या दूत बता कर लोगों में अंधी - श्रद्धा उत्पन्न करते हैं. जब उनका राज्य स्थापित हो जाता है तब वे अपने स्वार्थ के लिए अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के विरुद्ध भड़काते हैं.
प्र ३ अब तो , आपका पूजा - पाठ न देखा जाएगा , आपकी भलमनसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगी
उ हर धर्म का यही सन्देश है - प्रेम, मानवता. मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है. रीती - रिवाज़ और दूसरे धार्मिक शास्त्र हमें सदाचार के मार्ग की और ले जाने के लिए बनाये गए हैं. केवल उनका अंधविश्वास रूप में पालन करना और दूसरी ओर मानवता के विरुद्ध काम करना सही नहीं है। शुद्ध आचरण एवं सदाचार के मार्ग पर चलना ही सच्ची धार्मिकता कही जाएगी। इस समय की यही माँग है कि हम धर्म का पालन तो करें किन्तु साथ में हर धर्म और उससे अधिक मानव - मानव की रक्षा करें.
प्र ४ तुम्हारे माने से ही मेरा ईश्वरत्व कायम नहीं रहेगा , दया करके , मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो !
उ नास्तिक किन्तु मानवता का पालन करने वाले लोग धार्मिक किन्तु स्वार्थी लोगों से की अधिक अच्छे हैं, क्योंकि यह किसी धर्म में नहीं कहा गया है कि सिर्फ अपना जीवन सिद्ध करो, परन्तु यह कहा गया है कि औने उद्धार के साथ - साथ सह मानव का भी उद्धार करो. चाहे वो धन, अन्न या रक्षा के रूप में हो। केवल पूजा - अर्चना , नमाज़ या किसी बाहरी धार्मिकता किसी काम की नहीं।
समाप्त
सीता लक्ष्मी :-))
मौखिक प्रश्नोत्तर
प्र १ आज धर्म के नाम पर क्या क्या हो रहा है ?
उ धर्म के नाम पर आजकल व्यापार किया जा रहा है. अपने आप को धार्मिक समझने वाले, ऊँचे धार्मिक पद वाले आम जनता, जिसे धर्म का सही अर्थ नहीं मालूम, उनका शारीरिक तथा मानसिक रूप से शोषण कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण अज्ञानता है।
प्र २ धर्म के व्यापार को रोकने के लिए क्या उद्योग होने चाहिए ?
उ इस बुराई को रोकने के लिये हमें धर्म को सही अर्थों में समझना होगा। धर्म के नाम पर होने वाले ढोंग में सहकारी नहीं बनना चाहिए। इस नाम पर होने वाले सभी कुरीतियों का दृढ़ विशवास से निडर होकर लड़ना चाहिए।
प्र ३. लेखक के अनुसार स्वाधीनता आंदोलन का कौन - सा दिन सबसे बुरा था ?
उ स्वाधीनता आंदोलन का वह दिन सबसे बुरा कहा जा सकता है, जब, धर्माचार्यों, मुल्ला - मौलवियों एवं मठाधिपतियों को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया गया।
प्र ४ साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में क्या बात अच्छी तरह घर कर बैठी है ?
उ साधारण से साधारण आदमी के मन में यह बात घर कर गई है कि धर्म के नाम पर या उसकी सम्मान की रक्षा के लिए प्राण देना या प्राण लेना उचित है। यह धर्म को उसके गूढ़ तत्व के बारे में नहीं जानने का परिणाम है।
प्र ५ धर्म के स्पष्ट चिह्न क्या हैं ?
उ शुद्ध आचरण, सदाचार एवं हर प्राणी में ईश्वर को देखना ही धर्म के चिह्न हैं।
लिखित
प्र १ चलते - पुर्ज़े लोग धर्म के नाम पर क्या करते हैं ?
उ चलते - पुर्ज़े (read influential) लोग दरम के नाम पर लोगों की शक्तियों या दुर्बलता का भरपूर उपयोग करते हैं। साधारण लोगों की अज्ञानता का लाभ उठाकर वे अपना बोलबाला बनाये रखना चाहते हैं। इनका धंधा ऐसे भोले - भाले / अज्ञान लोगों की नींव पर चलता है।
प्र २ चालाक लोग साधारण आदमी की किस अवस्था का लाभ उठाते हैं ?
उ साधारण जनता बहुत ही धार्मिक और निष्ठावान होती है। उसे धर्म के गूढ़ तत्वों का पूर्ण ज्ञान नहीं। उसकी इसी अज्ञानता का परिपूर्ण लाभ उठाकर धर्म के नाम पर दंगे - फसाद करवाये जाते हैं। इसके पीछे, धार्मिक तथा राजनितिक नेताओं का अपना स्वार्थ होता है. साधारण जनता का घर जल जाता है जिसमे ये लोग अपने हाथ सेंकते हैं। (read: fulfill their desires)
प्र ३ आनेवाला समय किस प्रकार के धर्म को टिकने नहीं देगा ?
उ समय के साथ - साथ , कई कठिनाइयों एवं हानियों का सामना करके लोगों की समझ में यह आ गया है कि कुछ बड़े लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्म के नाम पर ढोंग करते हैं। शिक्षा - स्तर के बढ़ने से भी समाज में काफी बदलाव आ गया है। सभी को यह समझ आ गया है कि धर्म या मज़हब सिर्फ प्रेम-प्यार की भावना को बढ़ावा देता है घृणा को नहीं। मानव - मानव में ईश्वर को देखना और मानव- सेवा करना ही सच्चा धर्म है। :-)
प्र ४ कौन - सा कार्य देश की स्वाधीनता के विरुद्ध समझा जाएगा ?
उ स्वंतंत्र देश की यही सबसे बड़ी विशेषता है की प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिसाब से जीवन - यापन करने का अधिकार है. हमारा देश एक गणतंत्र (republic) राज्य है। इसमें किसी को भी अपने मनचाहे धर्म को पालन करने का हक़ है। किन्तु कुछ स्वार्थी लोग अपने मतलब के लिए धर्म के नाम पर लोगों को एक - दूसरे से लड़वाते हैं. धर्म को सही मायनों में न समझने वाले लोग इनकी बातों को मान कर मरने - मारने पर उतारहो जातें हैं। ऐसा कोई भी कार्य स्वाधीनता के विरुद्ध है।
प्र ५ पाश्चात्य देशों में धनी और निर्धन लोगों में क्या अंतर है ?
उ हमारे देश के लोगों की यह धारणा है कि पाश्चात्य के सभी निवासी धनी हैं, किन्तु यह सच्चाई से कोसों दूर है। वहां भी निर्धनता है। गरीब लोगों को लालच देखकर, उनका शोषण करके कुछ अमीर लोग अपना स्वार्थ निभाते हैं। हर देश की तरह यहाँ भी अमीर - ग़रीब का फ़र्क है. गरीब को लगातार संघर्ष के बाद ही सफलता मिलती है। समाजवाद (read Socialism) का जन्म इसी कारण हुआ।
प्र ६ कौन - से लोग धार्मिक लोगों से अधिक अच्छे हैं ?
उ कुछ लोग ईश्वरीय तत्व में विशवास नहीं रखते , किन्तु सह मानव के जीवन में अन्धकार दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, उनका दुःख दूर करने का हर संभव प्रयास करते हैं , लोगों को दह्र्म के नाम पर नहीं उकसाते एवं लड़ाई, झगड़ा या फसाद पैदा नहीं करते. ऐसे लोग धार्मिक लोगों से की गुना बेहतर हैं।
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर ५० - ६० शब्दों में दीजिए।
प्र १ 'धर्म और ईमान' के नाम पर किए जाने वाले भीषण व्यापार को कैसे रोका जा सकता है ?
उ आजकल धर्म के नाम पर व्यापार चलता है। हमें ऐसे कपटी धूर्त लोगों का पर्दाफ़ाश(read expose) करना होगा जो धर्म और ईमान के नाम पर लोगों को एक - दूसरे से लड़वाते हैं। मनुष्य एक दूसरे के प्राण लेते हैं। यह सब रोकने के लिए हम धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में समझना होगा। रीति - रिवाज़ों के सच्चे अर्थ समझने होंगे। यह समझना आवश्यक है कि मनुष्यता से पर कोई धर्म नहीं है।
प्र २ 'बुद्धि पर मार' के सम्बन्ध में लेखक के क्या विचार हैं ?
उ मनुष्य और पशु - पक्षियों में सबसे बड़ा अंतर यही है कि हम सोचने - समझने की शक्ति रखते हैं. किसी भी हालात में मनुष्य को अपनी यह समझ नहीं खोनी चाहिए। किसी की चिकनी - चुपड़ी बातों में आकर अपना आपा नहीं खोना चाहिए। हर हालत में अपनी सोच का सही इस्तेमाल कर निश्चय लेना चाहिए।
प्र ३ लेखक की दृष्टी में धर्म की भावना कैसी होनी चाहिए ?
उ लेखक के अनुसार धर्म की भावना सदाचार, शुद्ध आचार - विचार एवं जीवनशैली का मेल है। केवल धार्मिक रीति -रिवाज़ों का आँख मूँद कर पालन नहीं करना चाहिए वरन मनुष्यता के भाव होने चाहिए। लोक - कल्याण हेतु कार्य करने चाहिए। यह समझना चाहिए कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। अपने धर्म का ही नहीं बल्कि बाकी धर्मों का भी सम्मान करना आवश्यक है।
प्र ४ महात्मा गांधी के धर्म - सम्बन्धी विचारों पर प्रकाश डालिए।
उ महात्मा गांधी जी के जीवन में धर्म का सर्वोपरि स्थान था। वे जीवन के हर कदम पर धर्म का आचरण करते थे। उनका धर्म सत्य , अहिंसा एवं लोक - कल्याण था। उनके अनुसार धर्म में केवल उच्च भावनाओं के लिए ही स्थान होना चाहिए।
प्र ५ सबके कल्याण हेतु अपने आचरण को सुधारना क्यों आवश्यक है ?
उ हम ऐसे समय में रहते हैं, जहाँ मनुष्यता धीरे - धीरे समाप्त होती जा रही है. मनुष्य के मन में घृणा, स्वार्थ, अज्ञानता, जलन आदि ने घर कर लिया है, इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन को सदाचार एवं शुद्ध विचारों से भरें। अपने हित के बारे में ही सदैव विचार न करें अपितु समाज के उत्थान के लिए भी कमर कसें। यदि मन में शुद्ध विचार का अभाव हो और पूजा - पाठ एवं रीति - रिवाज़ों आँख मूँद कर पालन करें तो समय ही व्यर्थ जाएगा। जान कल्याण सदाचार आवश्यक है।
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।
प्र १ उबाल पड़ने वाला साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह कुछ भी नहीं समझता - बूझता, और दूसरे लोग उसे जिधर भी जोत देते है, उधर जुत जाता है।
उ इसका आशय यह है कि साधारण व्यक्ति के मन में धर्म के प्रति अंधी - श्रद्धा होती है, वह धर्म के गूढ़ तत्वों को नहीं समझता। वह धर्म के नाम पर प्राण देना या लेना पुण्य समझता है। उसके इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर समाज - विरोधी तत्व उससे दंगे - फसाद करवाते है। उसे जो कहा जाता है , अपनी बुद्धि का उपयोग न करते हुए कर डालता है।
प्र २ यहाँ पर बुद्धि पर पर्दा डालकर पहले ईश्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना, और फिर धर्म, ईमान, ईश्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वार्थ - सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाना - भिड़ाना।
उ भारत एक धार्मिक देश है। प्राचीनकाल से यहाँ बहुत सारे धार्मिक गुरुओं तथा संतों का जन्म हुआ है. इसी बात का फ़ायदा उठाकर कुछ स्वार्थी लोग अपने को भगवान का अवार या दूत बता कर लोगों में अंधी - श्रद्धा उत्पन्न करते हैं. जब उनका राज्य स्थापित हो जाता है तब वे अपने स्वार्थ के लिए अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के विरुद्ध भड़काते हैं.
प्र ३ अब तो , आपका पूजा - पाठ न देखा जाएगा , आपकी भलमनसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगी
उ हर धर्म का यही सन्देश है - प्रेम, मानवता. मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है. रीती - रिवाज़ और दूसरे धार्मिक शास्त्र हमें सदाचार के मार्ग की और ले जाने के लिए बनाये गए हैं. केवल उनका अंधविश्वास रूप में पालन करना और दूसरी ओर मानवता के विरुद्ध काम करना सही नहीं है। शुद्ध आचरण एवं सदाचार के मार्ग पर चलना ही सच्ची धार्मिकता कही जाएगी। इस समय की यही माँग है कि हम धर्म का पालन तो करें किन्तु साथ में हर धर्म और उससे अधिक मानव - मानव की रक्षा करें.
प्र ४ तुम्हारे माने से ही मेरा ईश्वरत्व कायम नहीं रहेगा , दया करके , मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो !
उ नास्तिक किन्तु मानवता का पालन करने वाले लोग धार्मिक किन्तु स्वार्थी लोगों से की अधिक अच्छे हैं, क्योंकि यह किसी धर्म में नहीं कहा गया है कि सिर्फ अपना जीवन सिद्ध करो, परन्तु यह कहा गया है कि औने उद्धार के साथ - साथ सह मानव का भी उद्धार करो. चाहे वो धन, अन्न या रक्षा के रूप में हो। केवल पूजा - अर्चना , नमाज़ या किसी बाहरी धार्मिकता किसी काम की नहीं।
समाप्त
सीता लक्ष्मी :-))
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