Wednesday, 24 February 2016

Khushbu rachte hain haath! :-)

खुशबू रचते हैं हाथ।

प्र  १ 'खुशबू रचनेवाले हाथ' कैसी परिस्थितियों में तथा कहाँ -कहाँ रहते हैं ?

उ  हमारे जीवन को खुशबू से भर देने वाले मज़दूरों का जीवन अत्यंत दयनीय है।  वह बहुत ही कठोर एवं कठिन परिस्थितियों में अपना जीवनयापन करते हैं।  वे गन्दी गलियों में, बस्तियों में कूड़े - करकट के आसपास या नाले के किनारों में, झोपड़ियों में रहते हैं।  वे इस दुर्गन्धपूर्ण वातावरण में रहने को विवश हैं.

प्र   २  कविता में कितने तरह के हाथों की चर्चा हुई है?

उ  इन निम्नलिखित हाथों की चर्चा कविता में हुई है :

अ     उभरी नसों वाले अर्थात बूढ़े हाथ ,
आ    घिसे नाखूनों वाले मज़दूरों के हाथ ,
इ     पीपल के पत्तों जैसे नए - नए हाथ अर्थात छोटे बच्चों के हाथ ,
ई     जूही के दाल जैसे खुशबूदार, नवयुवतियों के हाथ ,
उ     गंदे, कटे - पिटे हाथ , अत्यंत मेहनत किए हुए हाथ ,
ऊ    ज़ख्म से फ़टे हाथ  इत्यादि।

प्र   ३  कवि ने यह क्यों कहा कि  'खुशबू रचते हैं हाथ' ?

उ  इसका सीधा अर्थ यह है कि  सुगन्धित अगरबत्तियों का निर्माण करने वाले, सभी के जीवन को महका देने वाले हाथ, बहुत ही कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन बिताते हैं. यह छोटी झोपड़ियों में दुर्गन्धपूर्ण वातावरण में रहते हैं।  इसका गूढ़ अर्थ यह बतलाता है कि श्रमिक बका जीवन पथ दुर्गम है वह हमारे लिए सुख - सुविधा के कई साधन बनाते है, किन्तु स्वयं निर्धनता भोगते हैं. महल बनाने वाले मज़दूर झोपड़ियों में रहते है, वाहन बनाने वाले पैदल जाते हैं. इसी तरह खुशबू फैलाने वाले हाथ बदबू के बीच रहने को मजबूर है।

प्र  जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं , वहाँ का माहौल कैसा होता है?

उ  इस कविता में यह कहा गया है कि  अगरबत्तियाँ बनाने वाले मज़दूर गंदे नालियों के बीच, कूड़े-करकट के आसपास,बदबू भरे वातावरण में झोपड़ियों में रहने को विवश हैं।

प्र   इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उ  इस कविता में श्रमिक / मज़दूर वर्ग की कठिनाइयों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया जा रहा है।  समाज को सभी तरह की सुख-सुविधाएँ एवं सेवा प्रदान करने वाले श्रमिक का जीवन की विषमताओं से भरा हुआ है. हमारा कर्तव्य इनका उद्धार करना भी है।  हमें यह प्रयास करना चाहिए कि  इनका जीवन - स्तर भी आगे बढे।

समाप्त

सीता लक्ष्मी :-)

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