नए इलाके में
इन नए बस्ते इलाकों में
जहां रोज़ बन रहे हैं नए - नए मकान
मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ
भावार्थ :
कवि किसी नई बस्ती में पहुंचता है तो अकसर अपना रास्ता भूल जाता है, कारण यह कि वहां रोज़ नए - नए मकान बन रहें हैं। इसलिए, उन्होंने आने - जाने का रास्ता और ठिकानों तक पहुँचने के लिए जो निशान बनाए थे, वे अब काम नहीं आते। वह पीपल का पुराना पेड़ खोजता है या कोई टूटा हुआ घर ढूँढता है या वो ज़मीं का खाली टुकड़ा, जहां से उसे बाएँ मुड़ना था। किन्तु बहुत समय बाद ये सारे निशान वहां पर मौजूद नहीं थे। लोगों ने पीपल के पेड़ को उखाड़ दिया, ज़मीं का खाली टुकड़ा नहीं रहा क्योंकि वहां पर एक मकान खड़ा था। अत: उसकी साड़ी पुरानी निशानियाँ अब बेमानी हो गईं। उसे याद था कि खाली प्लॉट के दो मकान बाद इकमंज़िला मकान था जिसके बहार बिना रंग वाला एक लोहे का फाटक था. परन्तु समय के साथ - साथ इकमंज़िला दोमंज़िले में बदल गया और फाटक सज - धज गया। इन कारणों से या तो वह अपने घर के बिलकुल आगे पहुँच जाता या बहुत पीछे रह जाता।
पद्य :
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीं का खाली टुकड़ा जहा से बाएँ
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंज़िला
इन नए बस्ते इलाकों में
जहां रोज़ बन रहे हैं नए - नए मकान
मैं अकसर रास्ता भूल जाता हूँ
भावार्थ :
कवि किसी नई बस्ती में पहुंचता है तो अकसर अपना रास्ता भूल जाता है, कारण यह कि वहां रोज़ नए - नए मकान बन रहें हैं। इसलिए, उन्होंने आने - जाने का रास्ता और ठिकानों तक पहुँचने के लिए जो निशान बनाए थे, वे अब काम नहीं आते। वह पीपल का पुराना पेड़ खोजता है या कोई टूटा हुआ घर ढूँढता है या वो ज़मीं का खाली टुकड़ा, जहां से उसे बाएँ मुड़ना था। किन्तु बहुत समय बाद ये सारे निशान वहां पर मौजूद नहीं थे। लोगों ने पीपल के पेड़ को उखाड़ दिया, ज़मीं का खाली टुकड़ा नहीं रहा क्योंकि वहां पर एक मकान खड़ा था। अत: उसकी साड़ी पुरानी निशानियाँ अब बेमानी हो गईं। उसे याद था कि खाली प्लॉट के दो मकान बाद इकमंज़िला मकान था जिसके बहार बिना रंग वाला एक लोहे का फाटक था. परन्तु समय के साथ - साथ इकमंज़िला दोमंज़िले में बदल गया और फाटक सज - धज गया। इन कारणों से या तो वह अपने घर के बिलकुल आगे पहुँच जाता या बहुत पीछे रह जाता।
पद्य :
धोखा दे जाते हैं पुराने निशान
खोजता हूँ पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीं का खाली टुकड़ा जहा से बाएँ
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंगवाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंज़िला
भावार्थ: कवि कहता है कि नए इलाके के नै बस्ती में रोज़ कुछ - ना कुछ नया बन जाता है। कुछ और नए मकान बनते हैं, कुछ नै घटना घाट जाती है. इसलिए यहाँ पुराने जगह ढूंढने के लिए अपनी याददाश्त पर वह भरोसा नहीं कर सकता। पुरानी यादें , पुरानी निशानियाँ बेमाने / बेमतलब हो गईं हैं। जब अपने पुराने यादों के सहारे वह नए जाता है तो ऐसा आश्चर्य होता है जैसे वह बैसाख का गया वापस आया हो , मतलब एक लम्बे अंतराल / समय के बाद लौटा हो। परिवर्तन प्रकृति का मूल नियम है , इसे हम जितनी जल्दी अपना लें , उतना ही अच्छा है। पुरानी यादों के सहारे वर्तमान जीवन को जीना बहुत बड़ी भूल होगी।
Seetha Lakshmi. :-)
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